सुमित्रानन्दन पंत के अनुसार उनकी रचना “भारत माता’ में प्रवासिनी किसको कहा जाता है ? इस कविता के आशय को समझाइए ।

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महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने भारत माता कविता में भारत के सौन्दर्य का चित्रण किया है। सुमित्रानंदन पंत छायावाद के आधारस्तम्भ और समकालीन काव्य साहित्य के प्रतिनिधि कवि हैं।

आपने ‘भारत माता’ कविता में राष्ट्रीय भावों की अभिव्यक्ति की है। सुमित्रानंदन पंत ‘भारत माता’ कविता में भारतवर्ष की महिमा का चित्रण करते हुए कहते हैं कि हे भारत माता! आप ग्रामों में निवास करती हैं। भारतमाता दुःखी है क्योंकि अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने उसे बन्धनों में जकड़ रखा है। उसके वक्षस्थल पर बहने वाली गंगा-यमुना सरिताएँ अपने नेत्रों से अश्रुजल बहा रही हैं। वह मिट्टी की प्रतिमा के समान शांत और उदास है।

भारत माता के मुख पर दीनता का भाव है। वह नित अपने मुख को झुकाये है। उसके होठों से निरन्तर रुदन के स्वर निकलते रहते हैं। युग-युग का अंधकार उसके दुःखी मन व्याप्त है। यद्यपि भारत माता इस देश की स्वयं स्वामिनी है, लेकिन वह प्रवासिनी के समान जीवन जी रही है।

भारत माता की तीस करोड़ संतानें अपने नग्न खुले शरीर लिए हैं। उनका आधा खुला शरीर भूखा है, जिसका शोषण किया जा रहा है। जो मूर्ख अनपढ़, अज्ञानी, असभ्य और गरीब हैं उनका मस्तक सदैव झुका रहता है। वे वृक्षों के नीचे खुले में अपना जीवन यापन कर रहे हैं। भाषा शैली ‘भारत माता’ कविता छायावादी युग के प्रमुख आधार स्तंभ श्री सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित एक शांत रस प्रधानता वाली राष्ट्रभक्ति को व्यक्त करती रचना है। पंत जी इस रचना में सरल, सरस भाषा में छंद की उन्मुक्तता तथा शैली की स्वाभाविकता स्पष्ट झलकती है।

प्रस्तुत रचना में ‘भारत माता’ को ग्रामवासिनी जैसे रूपक से अलंकृत किया गया है। इसके साथ ही इसमें अलंकारों का अवसर अनुकूल भरपूर प्रयोग किया गया है। जैसे-रूपक पुनरोक्ति प्रकाश, क्षेकांनुप्रास अलंकार। सीधे शब्दों में कहें तो रूपक व अनुप्रास अलंकारों का ही प्रयोग किया गया है। कविता में आलंकारिकता के साथ ही ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता का भी समावेश किया गया है।